विश्वविख्यात रामनगर रामलीला के छठे दिन का प्रसंग एक अलौकिक और दिव्य अनुभव लेकर आया, जिसमें भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह का संपूर्ण आयोजन अत्यंत विधिपूर्वक संपन्न किया गया। यह लीला तुलसीदासजी की गीतावली पर आधारित रही और वैदिक मंत्रोच्चारण, पारंपरिक रीति-रिवाजों तथा जीवंत अभिनय से परिपूर्ण थी। दूत संवाद से आरंभ हुआ कथा का प्रवाह कथा का आरंभ अयोध्या में हुआ, जहां जनकदूत द्वारा महाराज दशरथ को पत्रिका सौंपी जाती है। इस दृश्य को मंच पर इतने भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया कि दर्शकों की आंखें नम हो गईं। बच्चन गुरुजी ने जनकदूत का पात्र निभाते हुए जब चौपाइयां बोलीं –देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ॥ तो पूरा परिसर भक्ति भाव में डूब गया। संवादों में प्रेम, दर्शन और वीर रस का अद्भुत संगम था। अयोध्या से जनकपुर तक निकली भव्य बारात महाराज दशरथ, गुरु वशिष्ठ और समस्त अयोध्यावासियों सहित राम जी की बारात रथ, घोड़ों और बाजे-गाजे के साथ जनकपुर के लिए प्रस्थान करती है। लीला में यह दृश्य इतना मनोहारी रूप में प्रस्तुत हुआ कि दर्शक स्वयं को बारात का हिस्सा मान बैठे। जनकपुर पहुंचने पर बारातियों का स्वागत पारंपरिक गीतों और मंगल वाद्ययंत्रों से किया गया। राम-लक्ष्मण से मिला जनवासियों का स्नेह राम-लक्ष्मण और भरत-सत्रुघ्न के दर्शन कर जनकपुर की सखियाँ और नारियाँ उनके रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गईं। आकाश से देवता, यक्ष और ऋषिगण भी इस दिव्य दृश्य को देखने उतरे। बाबा (लीला लेखक) की पंक्तियाँ –”इंद्र को जो श्राप मिला था कि उन्हें सहस्त्र नेत्र मिलें, आज वह वरदान लगने लगा” श्रोता-दर्शकों को भाव-विभोर कर गई। विवाह मंडप और मंत्रोच्चारण मुख्य विवाह मंडप में गुरु वशिष्ठ और सतानंद जी ने वैदिक मंत्रों के साथ विवाह की संपूर्ण विधियाँ संपन्न कराईं। महारानी सुनैना जी ने परंपरागत गीतों के साथ चारों भाइयों की आरती की, जिसमें मुसर-लोढ़ा से परछन का दृश्य लोक परंपरा का अनोखा प्रतीक बना। जनक जी का कन्यादान – एक अद्वितीय क्षण जनक जी द्वारा सीता का कन्यादान करते समय का दृश्य अत्यंत भावुक था। बाबा की पंक्तियाँ – “मंगल मूल लगन दिन आवा, हिम ऋतु अग हुन मा सु सुहवा” – सुनते ही पूरा वातावरण देवत्व से भर गया। विवाह के समय की सजावट, मंडप की झांकी, देवताओं की उपस्थिति, वेदों का गान सबकुछ दर्शकों को त्रेतायुग की अनुभूति करा गया। अंत में हुई भव्य आरती छठे दिन का समापन एक भव्य आरती से हुआ, जिसमें हजारों लीला प्रेमियों ने दीप जलाकर श्रीराम और सीता माता का गुणगान किया। हर ओर घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चारण और “सीता-राम विवाह की जय” के जयकारे गूंज रहे थे। श्रोता बोले-रामनगर रामलीला का यह विवाह प्रसंग केवल मंचन नहीं, अपितु एक जीवंत परंपरा का निर्वहन है, जहां हर पात्र में श्रद्धा, हर संवाद में भक्ति और हर आयोजन में संस्कृति की गहराई दिखाई देती है। यही कारण है कि यह लीला युनेस्को द्वारा भी विश्व धरोहर घोषित की जा चुकी है।
