गर्दन पर घड़े, कंधे पर 100 किलो वजन बांधकर फेंका:पिता ने बताया-क्यों किया बेटी की लाश के साथ ऐसा; मां बोली-तीन मौत पर ऐसा किया

नदी में उतरता शव, गर्दन पर दो घड़े और कंधे पर बंधीं पत्थरों से भरी बोरियां…रीवा के नीबा गोहट गांव की नदी में इस तरह एक लड़की का शव मिलने के बाद सभी को चौंका दिया था। शव पर चोट के निशान थे और उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसकी हत्या कर शव नदी में फेंक दिया हो। शव के मिलते ही पुलिस ने जांच शुरू की तो किशोरी नीबा गोहट गांव से 8 किलोमीटर दूर देवरी गांव की निकली। जब पुलिस देवरी गांव पहुंची तो उसके पिता ने कई चौकाने वाले खुलासे किया। किशोरी के पिता का कहना था कि खड़े-खड़े गिर जाने और मुंह पर गंभीर चोट होने के कारण अस्पताल में उसकी 11 अगस्त को ही मौत हो गई थी। इस मामले को लेकर भास्कर टीम देवरी पहुंची। पुलिस और परिजनों से शव के बारे में जानकारी ली तो परत दर परत मामला खुलता चला गया। पढ़िए सिलसिलेवार पूरी रिपोर्ट… सबसे पहले पढ़िए पूरा घटनाक्रम… 13 अगस्त को ग्रामीणों ने सूचना दी कि नीबा गोहट गांव में नदी एक लड़की की लाश है। पुलिस मौके पर पहुंची और लाश को पानी के बाहर लेकर आई। लाश जिस हालत में दिखी, पुलिस भी उसे देखकर हैरान रह गई। गर्दन पर दो घड़े बंधे हुए थे। वहीं, कंधे पर 100 किलो वजन की बोरी लटकी हुई थी। बोरी में बड़े-बड़े पत्थर भरे हुए थे। पुलिस भी समझ नहीं पा रही थी कि आखिरकार लाश के साथ ऐसा किसने और क्यों किया है। उसने नदी में लाश को इस हालत में क्यों फेंका है। लाश किसकी है और ऐसा करने के पीछे क्या मकसद है, इसे लेकर आसपास पूछताछ की गई, लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया। बाद में पुलिस को पता चला की शव देवरी गांव के यादव बस्ती के रहने वाले राधेश्याम यादव की बेटी सविता यादव का है। पुलिस की एक टीम राधे श्याम यादव के घर पहुंची। पिता को संदेही मानकर पूछताछ शुरू हुई। पिता बोला-परंपरा के अनुसार जल में प्रवाहित कर दिया पिता राधेश्याम ने पुलिस को बताया कि बेटी को मिर्गी के दौरे पड़ते थे। वह अक्सर बीमार रहा करती थी। 11 अगस्त को दोपहर के समय अचानक उसे मिर्गी के झटके आए। वह खड़े-खड़े अचानक नीचे मुंह के बल नीचे गिरी, उसके सिर पर गंभीर चोंट आई। हम उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। हमने परिवार और ग्रामीणों से बात की। इसके बाद परंपरा के मुताबिक हमने उसे घर से थोड़ी दूर में मौजूद महाना नदी के पथरहवा घाट में ले जाकर प्रवाहित कर दिया। परंपरा अनुसार ही वजन शरीर पर बांधकर नदी में फेंका गया था। पिता ने बताया क्यों बांधा गया था बेटी के शरीर पर 100 किलो वजन भास्कर टीम इस पूरे घटनाक्रम को समझने नीबा गोहट गांव पहुंची। यहां पिता राधेश्याम यादव से बात की। उन्होंने कहा- शायद भगवान को यही मंजूर था। हमने झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र से लेकर कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बेटी के जाने के बाद पहली बार हमारी चौखट पर पुलिस पहुंची। नदी से लाश निकलवाकर पोस्टमार्टम भी करवाया गया। पुलिस ने जब पूछताछ की तो हमने सारी चीज खुलकर बताई। इसके बाद पुलिस को भी यह भरोसा हुआ कि यह कोई हत्या का मामला नहीं बल्कि यह मामला मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। इसके बाद पुलिस ने पोस्टमार्टम होते ही अगले ही दिन बेटी की लाश हमें सुपुर्द कर दी। पुलिस ने कहा कि अब लाश को नदी में मत बहाना। नहीं तो फिर किसी अलग थाना क्षेत्र में बहकर नदी के रास्ते चली जाएगी, जिससे एक बार फिर तुम्हारा पूरा परिवार मुसीबत में फंस सकता है, इसलिए तुम अब लाश को दफन कर दो। वह ज्यादा ठीक रहेगा। इसके बाद हमने पुलिस के बताए मुताबिक लाश को दफन कर दिया। हालांकि कुछ समय के लिए हम डर गए थे। हमें लगा कि कहीं हम किसी झूठे केस में न फंस जाए। यह मान्यता ही कहीं हमारी मुसीबत और गले की फांस ना बन जाए, लेकिन बाद में पुलिस ने भी हमारी बात को समझा और ग्रामीण लोगों से पूछताछ के बाद हमें परेशान नहीं किया। मां ने कहा- मेरे गांव में तीन लोगों की मौत हुई थी लड़की की मां सुनीता यादव से बात करने पर उनकी बातों में अंधविश्वास साफ झलकता दिखा। उन्होंने मायके के तीन उदाहरण हमें गिना दिए। बोली- मेरे पिता को टीवी की बीमारी थी। मेरे भाई ने उनका अंतिम संस्कार किया तो वह भी खत्म हो गया। बाद में मेरे चाचा की भी मौत हो गई। यह परंपरा कोई झूठी परंपरा नहीं है। वास्तव में यह चीज होती है। हम लोगों का यही मानना है। केवल यह हम लोगों का नहीं, बल्कि गांव समाज के लोगों का भी यही मानना है। मेरा मायका उत्तर प्रदेश में है, वहां भी सभी यही मानते हैं। यह भी कारण है कि मेरी बेटी की मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार नहीं किया और उसकी लाश को नदी में प्रवाहित कर दिया गया। मेरे मायके में मेरे पिता परदेसी यादव, मेरे भाई जग प्रताप यादव और चाचा बिरजू यादव की मौत टीवी की बीमारी से हो चुकी है। यह मौत टीवी ग्रसित मरीज का अग्नि संस्कार करने से हुई। मुझे भी लोगों ने बहुत डराया था, सकुशल हूं ईश्वर का शुक्रिया रामसनेही पांडे ने बताया कि यह मान्यता कोई नई नहीं है। मेरी उम्र 70 साल है और बचपन से मैं इस मान्यता को देखता आ रहा हूं। खासकर त्योंथर में यह मान्यता पुरानी है, जिस पर लगभग लोग विश्वास करते हैं। मेरे भाई की मौत भी मिर्गी बीमारी से हुई थी। उस समय लोगों ने मुझे भी बहुत डराया और कहा कि तुम उसे नदी में प्रवाहित करो, नहीं तो तुम्हारे साथ अनहोनी हो जाएगी, लेकिन मैंने खुद अपने हाथों से अपने भाई का अंतिम संस्कार किया। भगवान की दया से मुझे कुछ नहीं हुआ और मैं पूरी तरह से स्वस्थ्य हूं। इस प्रथा को लेकर भास्कर ने वकील, कथावाचक, डाॅक्टर और पुलिस-प्रशासन से बात की… ऐसी कुप्रथा को बढ़ावा मिला तो अपराध तेजी से बढ़ेंगे सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता बीके माला ने कहा कि जिस तरह से प्रथा एक बड़े क्षेत्र में प्रचलित है। आश्चर्य की बात है कि 2025 चल रहा है और लोग आज के समय में भी इस प्रथा को सही मान रहे हैं। भला अंतिम संस्कार करने से किसी की बीमारी किसी को ट्रांसफर थोड़ी हो सकती है, लेकिन इस कुप्रथा से अपराध जरूर बढ़ेंगे। आपराधिक मानसिकता के लोग हत्या जैसी वारदात को इस परंपरा से जोड़ देंगे और शातिर तरीके से अपराध पर पर्दा डाल देंगे। इसको प्रथा की आड़ में अपराध और हत्या की वारदातों को अंजाम दे पाएंगे। कथा वाचक बोले- यह परंपरा सही नहीं टीम ने पूरे मामले में हमने धार्मिक दृष्टिकोण भी जानने की कोशिश की। इसके साथ यह भी जानने का प्रयास किया कि क्या यह परंपरा जो बीमारी के डर से जन्मी है। वह किसी प्रमाणित धर्मशास्त्र से भी जुड़ी हुई हो सकती है? भागवत कथावाचक कृष्णकांत शास्त्री ने बताया कि साफ तौर पर यह परंपरा ग्रामीणों की अज्ञानता और जागरूकता की कमी का परिणाम है। धार्मिक ग्रंथों में अंतिम संस्कार करने पर बीमारी ट्रांसफर होने जैसी किसी बात का जिक्र किसी धर्मशास्त्र में नहीं मिलता। प्रभारी कलेक्टर बोले- जागरूकता अभियान चलाकर कुप्रथा को दूर करेंगे प्रभारी कलेक्टर सौरभ सोनवानी ने बताया कि इस तरह की मान्यता को साफ तौर पर कुप्रथा कहा जा सकता है। प्रशासन इस कुप्रथा को दूर करने के लिए पहल करेगा। इस तरह की मान्यता को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। कानून व्यवस्था को भी बनाए रखने के लिए इस कुप्रथा को दूर किया जाना जरूरी है।

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