100 साल का संघ, एपिसोड-2:RSS को पहली बार मिला था 84 रुपए फंड, आज तक कोई बैंक खाता नहीं; कैसे काम करता है संघ

30 जनवरी 1948। जब महात्मा गांधी को गोली मारी गई, उस वक्त गोलवलकर चेन्नई में RSS की एक सभा में थे। एक स्वयंसेवक ने उन्हें इसकी सूचना दी। हत्यारा नाथूराम गोडसे हिंदू महासभा और RSS का सदस्य रहा था। गोलवलकर समझ गए कि RSS के लिए एक कठिन दौर शुरू होने वाला है। उन्होंने चेन्नई से ही प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को टेलीग्राम पर शोक संदेश भेजा। साथ ही गोलवलकर ने देशभर की शाखाओं के लिए एक निर्देश भी जारी किया… आदरणीय महात्माजी के दुखद निधन पर अपनी संवेदनाएं प्रकट करने के लिए शाखाओं में 13 दिन का शोक रहेगा और सभी दैनिक कार्यक्रम स्थगित रहेंगे। 2 फरवरी 1948 को गोलवलकर की गिरफ्तारी हुई और फिर RSS पर बैन लगा दिया गया। गिरफ्तारी के बाद गोलवलकर ने स्वयंसेवकों के नाम एक संदेश जारी किया- ‘संदेह के बादल छंट जाएंगे और हम बिल्कुल बेदाग बाहर निकलेंगे।’ 6 महीने की वैधानिक सीमा समाप्त होने के बाद गोलवलकर को रिहा किया गया और 11 जुलाई 1949 को RSS से भी प्रतिबंध हटा लिया गया। प्रतिबंध हटने के बाद गोलवलकर ने RSS के लिए एक नई रणनीति तैयार की। उन्होंने संघ के प्रसार के लिए अलग-अलग सहयोगी संगठन बनाने का फैसला किया। इसी का नतीजा था कि… 1973 में गोलवलकर अपने निधन से पहले RSS को एक ऐसा सांगठनिक स्वरूप दे चुके थे जो कि भविष्य की इसकी सारी सफलताओं की मजबूत नींव साबित हुई। अपने निधन से पहले गोलवलकर ने भी अपने उत्तराधिकारी के तौर पर मधुकर दत्तात्रेय देवरस उर्फ बालासाहब देवरस को चुन लिया। अब बात बालासाहब देवरस के बाद बने सरसंघचालकों की… 1994 में देवरस ने बीमारी की वजह से राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया को संघ प्रमुख बनाया। यह पहला मौका था जब किसी सरसंघचालक ने अपने जीवित रहते पद छोड़ा था। 2000 में केसी सुदर्शन और फिर 2009 से अब तक डॉ. मोहन भागवत संघ प्रमुख हैं। संघ प्रमुख के कार्यकाल को लेकर कोई तय समय-सीमा नहीं है। इस पर सितंबर 2018 में मोहन भागवत ने कहा- सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार रहे और उसके बाद गुरुजी। इसलिए वह श्रद्धा का स्थान है। मेरे बाद सरसंघचालक कौन होगा, ये मेरी मर्जी पर है और मैं सरसंघचालक कब तक रहूंगा, ये भी मेरी मर्जी पर है। अब बात RSS के वर्किंग स्ट्रक्चर की… सरसंघचालक RSS का सबसे बड़ा पद है। इसके बाद आता है सरकार्यवाह। ये केंद्रीय कार्यकारी मंडल का प्रमुख भी होता है। इसके बाद सह सरकार्यवाह आते हैं, जो एक से ज्यादा हो सकते हैं। इनके अंडर 5 डिपार्टमेंट के प्रमुख आते हैं- सेवा प्रमुख, प्रचार प्रमुख, बौद्धिक प्रमुख, शारीरिक प्रमुख और निधि प्रमुख। इससे नीचे संघचालक और प्रचारक आते हैं। ये फुल टाइम मेंबर होते हैं, लेकिन उन्हें संघ के किसी काम के लिए किसी तरह की सैलरी नहीं मिलती। प्रचारक के लिए एक अघोषित शर्त यह भी है कि वह शादी नहीं करेगा। हालांकि संघ के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। वरिष्ठ RSS नेताओं के निर्देशन में आर वैंकटरामा शास्त्री ने 1948 में RSS का संविधान लिखा। इसके आर्टिकल 22 में RSS की फंडिंग के तरीकों का जिक्र है। 1928 में संघ ने गुरुदक्षिणा की शुरुआत की। पहली बार 84 रुपए इकट्ठा हुए थे। हर साल व्यास पूर्णिमा के दिन संघ की हर शाखा में दक्षिणा दिवस मनाया जाता है। उस दिन स्वयंसेवक भगवा ध्वज को गुरु मानकर दान देते हैं। अगर रकम 20 हजार रुपए से ज्यादा हुई, तो चेक के माध्यम से दान दिया जाता है। हालांकि ये चेक किसके नाम पर होता है, इसकी जानकारी गोपनीय होती है। निधि प्रमुख इस फंड की देखरेख करता है। केंद्रीय कार्यकारी मंडल और प्रांतीय कार्यकारी मंडल तय करते हैं कि फंड्स का डिस्ट्रीब्यूशन कब और कैसे करना है। किस साल कितनी रकम दान में मिली, इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता। संघ का अपना कोई बैंक अकाउंट नहीं है। संघ कहता है कि उसके स्वयंसेवक बहुत-सी समाज सेवा की गतिविधियां करते रहे हैं और इन सामाजिक कार्यों के लिए स्वयंसेवकों ने ट्रस्ट बनाए हैं, जो कानून के दायरे में रहकर पैसा इकट्ठा करते हैं और अपने खाते चलाते हैं। संघ की प्रार्थना, उसकी यूनिफॉ​​​र्म से लेकर उसकी सोच तक में समय-समय पर बदलाव हुए हैं… प्रार्थना: संघ की शुरुआती प्रार्थना मराठी में थी। 1939 में इसे बदलकर संस्कृत में कर दिया गया, जिसकी शुरुआत नमस्ते सदा वत्सले से होती है। यूनिफॉर्म: शुरुआत में RSS की यूनिफॉर्म खाकी शर्ट, खाकी निकर और खाकी टोपी थी। जो 100 साल बाद बदलकर ऐसी हो गई- सफेद शर्ट, खाकी फुल पैंट, काली टोपी और बेल्ट। 1925 के ऐतिहासिक हालातों में बने संघ ने जहां गोलवलकर के रेडिकल विचारों से कदमताल करते हुए विस्तार पाया, वहीं आधुनिकता के अनुसार भी वह बदला है। अलग-अलग मसलों पर संघ की राय भी बदलती रही है… आरक्षण पर संघ: सितंबर 2015 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने की बात कही। हालांकि 28 अप्रैल 2024 को भागवत ने कहा- आरक्षण जिसके लिए है, उन्हें जब तक आवश्यक लगेगा या भेदभाव जब तक है, आरक्षण जारी रहना चाहिए। संघ अब जातिगत जनगणना का भी समर्थन करता है। अल्पसंख्यकों पर संघ: गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में बाहर से आए अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को राष्ट्र के लिए आंतरिक संकट बताया गया है, लेकिन सितंबर 2023 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- मुसलमान भी हमारे हैं। वो हमसे अलग नहीं हैं। उनकी पूजा पद्धति बदल गई है। यह देश उनका भी है और वह भी यहीं रहेंगे। संघ में महिलाएं: महिलाएं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्य नहीं बन सकतीं। इसे लेकर संघ की आलोचना होती है, लेकिन संघ का कहना है कि जिस समय संघ का गठन हुआ यह उस समय की व्यावहारिकता के अनुसार था। बाद में जब हिंदू महिलाओं के लिए भी एक संगठन की जरूरत महसूस हुई तो लक्ष्मीबाई केलकर ने RSS से विमर्श कर 1936 में राष्ट्र सेविका समिति शुरू की। दोनों का उद्देश्य एक ही है इसलिए महिलाएं राष्ट्र सेविका समिति से जुड़ सकती हैं। नागपुर में 5 लोगों की एक बैठक से शुरू हुआ संघ, आज दुनिया भर में फैला हुआ है। संघ का दावा है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। 40 से अधिक देशों में इसके करीब एक करोड़ स्वयंसेवक हैं। भारत में संघ की हर रोज 83 हजार से अधिक शाखाएं होती हैं, जिसमें लाखों स्वयंसेवक हिस्सा लेते हैं। इसी साल संघ ने दिल्ली के झंडेवालान में अपने भव्य कैंपस केशव कुंज का उद्घाटन किया है। इस कैंपस में 13 टावर्स हैं जिसमें करीब तीन सौ कमरे हैं। नागपुर में संघ के भव्य मुख्यालय के अलावा देश भर में RSS के कई कार्यालय हैं। अपने गठन के बाद पिछले 100 सालों में संघ ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और यह सिलसिला जारी है। ————–
ये भी पढ़ें… 100 साल का संघ, एपिसोड-1: मुस्लिमों का साथ देने पर गांधी से नाराज एक कांग्रेसी ने बनाया RSS, उनकी आखिरी चिट्ठी पढ़ सब हैरान क्यों रह गए 27 सितंबर 1925, उस दिन विजयादशमी थी। हेडगेवार ने पांच लोगों के साथ अपने घर में एक बैठक बुलाई और कहा- आज से हम संघ शुरू कर रहे हैं। लेकिन इसकी पूरी बैकस्टोरी क्या थी, पढ़िए पूरी खबर…

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